रास्ते में एक बिल्डिंग के सामने किसी वाहन से कुचलकर मरी हुई बिल्ली को कौवे खा रहे थे।
दो बच्चे पास ही सड़क के इस पार खड़े हुए थे। एक फुग्गा फुला रहा था और दूसरा साइकिल के टायर को घुमा रहा था। उनकी नजरें मगर उस कुचली हुई बिल्ली पर ही थी। मैं तटस्थ भाव से कतराकर बच्चों के पास से गुजरा तो सुना। एक बच्चा दूसरे से कह रहा था: ‘‘ अब तैं केखे आ म्यांउं कैहे रे ?’’ ख् अब तू किसे आ म्यांउं (बिल्ली) कहेगा ?,
और मैं तटस्थ नहीं रह सका। सैकड़ों बातें मेरे दिमाग में कौंध गई। पिग बैंक का वह बच्चा भी याद आने लगा जो पिता द्वारा बचत के लिए दिए गए चीनी मिट्टी के गुल्लक से आत्मीय रिश्ते बना लेता है। उसे तोड़ना नहीं चाहता । पैसों के लिए भी नहीं।यह जो कुचलकर मरी थी एक जीती जागती बिल्ली थी। लोग जीते जागते लोगों से वह रिश्ता नहीं बना पाते जो बच्चे बना लेते हैं। क्या यह रिश्ते निरे बचकाने हैं।
मैं जानता हूं कि इस घर में एक जो बूढ़ी अशक्त औरत है जिसको ये बच्चे इसी बिल्ली के बहाने दूध और रोटी दिया करते थे ,उसका भी एक सहारा और बहाना छिन गया था। मुझे लगा बच्चे फुसफुसाकर कह रहे हैं:‘‘ अब आजी के खाना चोराए नाने केको बहानो बनाहें बे ? ( अब हम दादी के लिए खाना चुराने के लिए किसका बहाना बनाएंगे यार ?)
